आरटीआई कानून की उड़ रही धज्जियाँ: 5 साल में 2493 अधिकारियों पर जुर्माना, लेकिन वसूली सिर्फ़ 286 से – 4.39 करोड़ अब भी बकाया

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मनेंद्रगढ़/रायपुर।
सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act) जिसे भ्रष्टाचार के खिलाफ एक क्रांतिकारी हथियार माना जाता है, उसकी धार अब कुंद होती नज़र आ रही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण छत्तीसगढ़ से सामने आया है जहाँ पिछले पांच वर्षों में हजारों जन सूचना अधिकारियों (PIOs) पर जुर्माना तो लगाया गया, लेकिन जुर्माना वसूली की प्रक्रिया में सरकार खुद फिसड्डी साबित हो रही है।

2493 अधिकारियों पर जुर्माना, लेकिन वसूली सिर्फ 286 से
मनेंद्रगढ़ निवासी आरटीआई कार्यकर्ता अशोक श्रीवास्तव ने वर्ष 2020 से लेकर फरवरी 2025 तक की जानकारी सूचना के अधिकार के तहत मांगी थी। जवाब में राज्य सूचना आयोग ने बताया कि इस अवधि में 2493 जन सूचना अधिकारियों पर कुल 4 करोड़ 81 लाख 77 हजार 188 रुपये का जुर्माना लगाया गया था। ये जुर्माने सूचना देने में जानबूझकर देरी, गलत जानकारी देने, या पूरी तरह से सूचना छिपाने के लिए लगाए गए थे।

हालांकि, आयोग के आदेशों के बावजूद, अब तक मात्र 286 अधिकारियों से 42 लाख 31 हजार 250 रुपये की ही वसूली हो सकी है। बाकी 4 करोड़ 39 लाख 45 हजार 938 रुपये की वसूली अधर में लटकी हुई है।

2207 अधिकारी अब भी ‘बकायादार’, सरकार की चुप्पी सवालों के घेरे में
आंकड़े बताते हैं कि 2207 अधिकारी अब तक जवाबदेही से बचते रहे हैं और शासन-प्रशासन की ओर से कोई सख्त कदम नहीं उठाया गया है। वसूली की जिम्मेदारी संबंधित विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों की होती है, लेकिन ना तो उन्होंने ठोस पहल की और ना ही राज्य सरकार ने इन अधिकारियों पर कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई की।

राज्य सूचना आयोग की अवहेलना, सरकार की चुप्पी
राज्य सूचना आयोग ने कई बार प्रमुख सचिव, विभागाध्यक्षों और सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) को पत्र लिखकर वसूली सुनिश्चित करने की अपील की। लेकिन ये पत्र सिर्फ फाइलों में धूल फांकते रह गए। आयोग के आदेश को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया — जो कि आरटीआई अधिनियम की भावना और वैधानिकता दोनों के लिए बड़ा झटका है।

क्या सरकार खुद अपने ही कानून की विरोधी बन गई है?
इस पूरे मामले में एक बड़ा सवाल खड़ा होता है — जब खुद सरकार अपने ही बनाए कानून को लागू कराने में नाकाम हो, तो आम जनता कैसे उम्मीद करे कि उसे न्याय और पारदर्शिता मिलेगी?

सूचना का अधिकार केवल दस्तावेज़ हासिल करने का ज़रिया नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की जवाबदेही तय करने का प्रभावशाली औजार है। लेकिन अगर इस पर ही कुठाराघात होता रहे, तो यह लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुंचाने जैसा है।

क्या मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव इस मामले को संज्ञान लेंगे  ?
अब सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और मुख्य सचिव इस मामले का संज्ञान लेंगे? क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी? या फिर यह मामला भी अन्य कई मामलों की तरह सरकारी सिस्टम की लेटलतीफी और उदासीनता की भेंट चढ़ जाएगा?

प्रशासनिक ढांचे की असफलता का प्रमाण
चार करोड़ से अधिक की वसूली ना होना कोई साधारण बात नहीं, यह सीधे-सीधे शासन की राजस्व नीति, प्रशासनिक दक्षता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। और अगर यही हाल रहा, तो आरटीआई अधिनियम महज़ एक दिखावटी कानून बनकर रह जाएगा — जिसकी आत्मा धीरे-धीरे दम तोड़ देगी।

अंत में…
आरटीआई कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर अब भी सरकार ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह लापरवाही पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। यह मुद्दा सिर्फ जुर्माना और वसूली का नहीं, बल्कि एक पूरे राज्य के प्रशासनिक चरित्र का आईना है — जिसमें पारदर्शिता कम और मनमानी ज़्यादा दिखाई दे रही है।

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Olivia Masskey

Carter

is a writer covering health, tech, lifestyle, and economic trends. She loves crafting engaging stories that inform and inspire readers.

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